Synonyms (पर्यायवाची)

  • हृदय - छाती, वक्ष, वक्षस्थल, हिय, उर।
  • हिमालय - हिमगिरी, हिमाचल, गिरिराज, पर्वतराज, नगेश।
  • हाथी - नाग, हस्ती, राज, कुंजर, कूम्भा, मतंग, वारण, गज, द्विप, करी, मदकल।
  • हाथ - हस्त, कर, पाणि।
  • स्वर्ण - कंचन, कनक, कुंदन, हेम, सोना।
  • स्वर्ग - सुरलोक, देवलोक, परमधाम, त्रिदिव, दयुलोक।
  • स्त्री - नारी, महिला, अबला, ललना, औरत, कामिनी, रमणी।
  • सोना - स्वर्ण, कंचन, कनक, हेम, कुंदन।
  • सूर्य - रवि, सूरज, दिनकर, प्रभाकर, आदित्य, दिनेश, भास्कर, दिवाकर।
  • सुगंधि - सौरभ, सुरभि, महक, खुशबू।
  • सिंह - केसरी, शेर, महावीर, हरि, मृगपति, वनराज, शार्दूल, नाहर, सारंग, मृगराज।
  • साँप - अहि, भुजंग, ब्याल, सर्प, नाग, विषधर, उरग, पवनासन।
  • समूह - दल, झुंड, वृंद, गण, पुंज।
  • समुद्र - सागर, पयोधि, उदधि, पारावार, नदीश, जलधि, सिंधु, रत्नाकर, वारिधि।
  • संसार - जग, विश्व, जगत, लोक, दुनिया।
  • शिव - भोलेनाथ, शम्भू, त्रिलोचन, महादेव, नीलकंठ, शंकर।
  • शिक्षक - गुरु, अध्यापक, आचार्य, उपाध्याय।
  • शरीर - देह, तनु, काया, कलेवर, अंग, गात।
  • शत्रु - रिपु, दुश्मन, अमित्र, वैरी, अरि, विपक्षी, अराति।
  • वृक्ष - पेड़, पादप, विटप, तरू, गाछ, दरख्त, शाखी, विटप, द्रुम।
  • विष्णु - नारायण, दामोदर, पीताम्बर, चक्रपाणी।
  • विष - ज़हर, हलाहल, गरल, कालकूट।
  • वन - कानन, विपिन, अरण्य, कांतार।
  • लक्ष्मी - कमला, पद्मा, रमा, हरिप्रिया, श्री, इंदिरा।
  • रात - रात्रि, रैन, रजनी, निशा, यामिनी, तमी, निशि, यामा, विभावरी।
  • राजा - नृप, नृपति, भूपति, नरपति, नृप, भूप, भूपाल, नरेश, महीपति, अवनीपति।
  • मोर - केक, कलापी, नीलकंठ, नर्तकप्रिय।
  • मेघ - बादल, पयोद, जलधर, पयोधर।
  • हिरण - मृग, सारंग, कृष्णसार।
  • मित्र - सखा, सहचर, साथी, दोस्त
  • माता - जननी, माँ, अंबा, जनयत्री, अम्मा।
  • मनुष्य - आदमी, नर, मानव, मानुष, मनुज।
  • शहद - मधु, रसा, शहद, कुसुमासव।
  • शराब - मदिरा, हाला, आसव, मधु, मद।
  • मछली - मीन, मत्स्य, जलजीवन, शफरी, मकर।
  • जेवर - भूषण, गहना, आभूषण, अलंकार।
  • बिजली - घनप्रिया, इन्द्र्वज्र, चंचला, सौदामनी, चपला, दामिनी, ताडित, विद्युत।
  • रेत - बालू, बालुका, सैकत।
  • बादल - मेघ, घन, जलधर, जलद, वारिद, नीरद, सारंग, पयोद, पयोधर।
  • बन्दर - वानर, कपि, कपीश, हरि।
  • भूमि - पृथवी, पृथिवी, भूमि, भूमी, अचला, अनन्ता, रसा, विश्वम्भरा, स्थिरा, धरा, धरित्री, धरणी, धरणि, वसुमती, वसुधा, वुसंधरा, अवनि, अवनी, मही, विपुला, रत्नगर्भा, जगती, सागराम्बरा, उर्वी, गोत्रा, क्ष्मा क्षमा, मेदिनी, गह्वरी, धात्री, गौरिला, कुम्भिनी, भूतधात्री, क्षोणी, क्षोणि, काश्यपी, क्षिति, सर्वेसृहा!
  • पुष्प - फूल, सुमन, कुसुम, मंजरी, प्रसून, पुहुप।
  • पुत्री - बेटी, आत्मजा, तनूजा, सुता, तनया।
  • पुत्र - बेटा, आत्मज, सुत, वत्स, तनुज, तनय, नंदन।
  • पहाड़ - पर्वत, गिरि, अचल, शैल, धरणीधर, धराधर, नग, भूधर, महीधर।
  • वायु - पवन, हवा, समीर, वात, मारुत, अनिल, पवमान, समीरण, स्पर्शन।
  • पत्नी - भार्या, वधू, वामा, अर्धांगिनी, सहधर्मिणी, गृहणी, बहु, वनिता, दारा, जोरू, वामांगिनी।
  • पति - स्वामी, प्राणनाथ, प्राणाधार, प्राणप्रिय, प्राणेश, आर्यपुत्र।
  • पक्षी - खेचर, दविज, पतंग, पंछी, खग, चिडिया, गगनचर, पखेरू, विहंग, नभचर।
  • नाव - नौका, तरणी, तरी।
  • नया - नूतन, नव, नवीन, नव्य।
  • नदी - सरिता, तटिनी, सरि, सारंग, जयमाला, तरंगिणी, दरिया, निर्झरिणी।
  • धरती - धरा, धरती, वसुधा, ज़मीन, पृथ्वी, भू, भूमि, धरणी, वसुंधरा, अचला, मही, रत्नवती, रत्नगर्भा।
  • धनुष - चाप, शरासन, कमान, कोदंड, धनु।
  • धन - दौलत, संपत्ति, सम्पदा, वित्त।
  • देवता - सुर, देव, अमर, वसु, आदित्य, लेख।
  • दूध - दुग्ध, क्षीर, पय।
  • दुष्ट - पापी, नीच, दुर्जन, अधम, खल, पामर।
  • दुर्गा - चंडिका, भवानी, कुमारी, कल्याणी, महागौरी, कालिका, शिवा।
  • दुःख - पीड़ा, कष्ट, व्यथा, वेदना, संताप, शोक, खेद, पीर, लेश।
  • दिन - दिवस, याम, दिवा, वार, प्रमान।
  • नौकर - दास, सेवक, चाकर, परिचारक, अनुचर।
  • दर्पण - शीशा, आरसी, आईना, मुकुर।
  • दरिद्र - निर्धन, गरीब, रंक, कंगाल, दीन।
  • तालाब - सरोवर, जलाशय, सर, पुष्कर, पोखरा, जलवान, सरसी।
  • गहना - जेवर, अलंकार, भूषण, आभरण, मंडल।
  • जल - अमृत, सलिल, वारि, नीर, तोय, अम्बु, उदक, पानी, जीवन, पय, पेय।
  • जंगल - विपिन, कानन, वन, अरण्य, गहन, कांतार, बीहड़, विटप।
  • चरण - पद, पग, पाँव, पैर।
  • चंद्रमा - चाँद, चंद्र, हिमांशु, इंदु, विधु, तारापति, चन्द्र, शशि, हिमकर, राकेश, रजनीश, निशानाथ, सोम, मयंक, सारंग, सुधाकर, कलानिधि।
  • घर - गृह, सदन, गेह, भवन, धाम, निकेतन, निवास, आलय, आवास, निलय, मंदिर।
  • गाय - गौ, धेनु, सुरभि, भद्रा, रोहिणी।
  • गर्मी - ताप, ग्रीष्म, ऊष्मा, गरमी, निदाघ।
  • गणेश - विनायक, गजानन, गौरीनंदन, गणपति, गणनायक, शंकरसुवन, लम्बोदर, महाकाय।
  • हाथी - गज, हस्ती, मतंग, कूम्भा, मदकल।
  • गंगा - देवनदी, मंदाकनी, भगीरथी, विश्नुपगा, देवपगा, ध्रुवनंदा, सुरसरिता, देवनदी, जाह्नवी, त्रिपथगा।
  • क्रोध - रोष, कोप, अमर्ष, कोह, प्रतिघात।
  • कोयल - कोकिला, पिक, काकपाली, बसंतदूत, सारिका, कुहुकिनी, वनप्रिया।
  • कृष्ण - राधापति, घनश्याम, वासुदेव, माधव, मोहन, केशव, गोविन्द, गिरधारी।
  • कृपा - प्रसाद,करुणा,दया,अनुग्रह।
  • किसान - कृषक, भूमिपुत्र, हलधर, खेतिहर, अन्नदाता।
  • किरण - रश्मि, अंशु, कर, मयुख, मरीच, ज्योति, प्रभा।
  • किताब - पोथी, ग्रन्थ, पुस्तक।
  • कान - कर्ण, श्रुति, श्रुतिपटल।
  • कमल - नलिन, अरविन्द, उत्पल, राजीव, पद्म, पदम्, पंकज, नीरज, सरोज, जलज, जलजात।
  • कपड़ा - चीर, वसन, पट, अंशु, कर, मयुख, वस्त्र, अम्बर, परिधान।
  • ओंठ - ओष्ठ, अधर, होठ।
  • ईश्वर - परमात्मा, प्रभु, ईश, जगदीश, भगवान, परमेश्वर, जगदीश्वर, विधाता।
  • इन्द्र - सुरेश, सुरेन्द्र, देवेन्द्र, सुरपति, शक्र, पुरंदर, देवराज।
  • इच्छा - अभिलाषा, अभिप्राय, चाह, कामना, लालसा, मनोरथ, आकांक्षा, अभीष्ट।
  • आश्रम - कुटी ,विहार,मठ,संघ,अखाडा।
  • आम - रसाल, आम्र, सौरभ, मादक, अमृतफल, सहुकार।
  • आनंद - हर्ष,सुख,आमोद,मोद,प्रमोद,उल्लास।
  • आत्मा - जीव, देव, चैतन्य, चेतनतत्तव, अंतःकरण।
  • कमल - जलज, पंकज, नलिन, पदम्, अरविंद, उत्पल, सरोज्, राजीव, नीरज।
  • आग - अग्नि, अनल, हुतासन, पावक, दहन, ज्वलन, धूमकेतु, कृशानु, वहनि, शिखी, वह्नि।
  • आकाश - नभ, गगन, अम्बर, व्योम, अनन्त, आसमान, अंतरिक्ष, शून्य, अर्श।
  • आंसू - नेत्रजल,नयनजल,चक्षुजल,अश्रु।
  • आँख - लोचन, नयन, नेत्र, चक्षु, दृग, विलोचन, दृष्टि, अक्षि।
  • अहंकार - दंभ, गर्व, अभिमान, दर्प, मद, घमंड।
  • असुर - दैत्य, दानव, राक्षस, निशाचर, रजनीचर, दनुज, रात्रिचर।
  • अश्व - हय, तुरंग, बाजी, घोड़ा, घोटक।
  • अर्थ - धन्, द्रव्य, मुद्रा, दौलत, वित्त, पैसा।
  • अमृत - सुधा, अमिय, पीयूष, सोम, मधु, अमी।
  • अनुपम - अपूर्व, अतुल, अनोखा, अदभुत, अनन्य।
  • अतिथि - मेहमान, अभ्यागत, आगन्तुक, पाहूना।
  • अग्नि - अनल, पावक, वहनि, कृशानु, शिखी।
  • अंहकार - गर्व,अभिमान,दर्प,मद,घमंड।।
  • अंधकार - तम, तिमिर, तमिस्र, अँधेरा।

Poems Of सूरदास

Surdas
जन्म:- 1478 ई॰ -- निधन:- 1584 ई॰

साखी
पद
रमैणी

सूरसागर (ग्रंथ)

श्रीकृष्णबाल माधुरी (ग्रंथ)

भजनों का संग्रह

कविताओं का संग्रह

जीवन परिचय:

सूरदास हिन्दी साहित्य में भक्ति काल के सगुण भक्ति शाखा के कृष्ण-भक्ति उपशाखा के महान कवि हैं। हिन्ढी साहित्य में कृष्ण-भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में महाकवि सूरदास का नाम अग्रणी है। कृष्ण भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में सूरदास का नाम सर्वोपरि है। हिन्दी साहित्य में भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास हिंदी साहित्य के सूर्य माने जाते हैं। हिंदी कविता कामिनी के इस कमनीय कांत ने हिंदी भाषा को समृद्ध करने में जो योगदान दिया है, वह अद्वितीय है।

सूरदास का जन्म १४७८ ईस्वी में रुनकता नामक गांव में हुआ। यह गाँव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में ये आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे। सूरदास के पिता रामदास गायक थे। सूरदास के जन्मांध होने के विषय में मतभेद है। प्रारंभ में सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे। वहीं उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। सूरदास की मृत्यु गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में १५८४ ईस्वी में हुई।

सूरदास की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है।
"साहित्य लहरी' सूर की लिखी रचना मानी जाती है। इसमें साहित्य लहरी के रचना-काल के सम्बन्ध में निम्न पद मिलता है
मुनि पुनि के रस लेख।
दसन गौरीनन्द को लिखि सुवल संवत् पेख॥

इसका मतलब विद्वानों ने संवत् १६०७ वि० माना है, अतएव "साहित्य लहरी' का रचना काल संवत् १६०७ वि० है। इस ग्रन्थ से यह भी प्रमाण मिलता है कि सूर के गुरु श्री बल्लभाचार्य थे।

सूरदास का जन्म सं० १५३५ वि० के लगभग ठहरता है, क्योंकि बल्लभ सम्प्रदाय में ऐसी मान्यता है कि बल्लभाचार्य सूरदास से दस दिन बड़े थे और बल्लभाचार्य का जन्म उक्त संवत् की वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए सूरदास की जन्म-तिथि वैशाख शुक्ला पंचमी, संवत् १५३५ वि० समीचीन जान पड़ती है। अनेक प्रमाणों के आधार पर उनका मृत्यु संवत् १६२० से १६४८ वि० के मध्य स्वीकार किया जाता है। रामचन्द्र शुक्ल जी के मतानुसार सूरदास का जन्म संवत् १५४० वि० के सन्निकट और मृत्यु संवत् १६२० वि० के आसपास माना जाता है।
श्री गुरु बल्लभ तत्त्व सुनायो लीला भेद बतायो।

सूरदास की आयु "सूरसारावली' के अनुसार उस समय ६७ वर्ष थी। 'चौरासी वैष्णव की वार्ता' के आधार पर उनका जन्म रुनकता अथवा रेणु का क्षेत्र (वर्तमान जिला आगरान्तर्गत) में हुआ था। मथुरा और आगरा के बीच गऊघाट पर ये निवास करते थे। बल्लभाचार्य से इनकी भेंट वहीं पर हुई थी। "भावप्रकाश' में सूर का जन्म स्थान सीही नामक ग्राम बताया गया है। वे सारस्वत ब्राह्मण थे और जन्म के अंधे थे। "आइने अकबरी' में (संवत् १६५३ वि०) तथा "मुतखबुत-तवारीख' के अनुसार सूरदास को अकबर के दरबारी संगीतज्ञों में माना है।

क्या सूरदास जन्मांध थे?
श्यामसुन्दर दास ने इस सम्बन्ध में लिखा है - "सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं थे, क्योंकि श्रृंगार तथा रंग-रुपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई जन्मान्ध नहीं कर सकता।" डॉक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है - "सूरसागर के कुछ पदों से यह ध्वनि अवश्य निकलती है कि सूरदास अपने को जन्म का अन्धा और कर्म का अभागा कहते हैं, पर सब समय इसके अक्षरार्थ को ही प्रधान नहीं मानना चाहिए।"
सूरदास श्रीनाथ की "संस्कृतवार्ता मणिपाला', श्री हरिराय कृत "भाव-प्रकाश", श्री गोकुलनाथ की "निजवार्ता' आदि ग्रन्थों के आधार पर, जन्म के अन्धे माने गए हैं। लेकिन राधा-कृष्ण के रुप सौन्दर्य का सजीव चित्रण, नाना रंगों का वर्णन, सूक्ष्म पर्यवेक्षणशीलता आदि गुणों के कारण अधिकतर वर्तमान विद्वान सूर को जन्मान्ध स्वीकार नहीं करते।

सूरदास की रचनाएँ

सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं-
१. सूरसागर - जो सूरदास की प्रसिद्ध रचना है। जिसमें सवा लाख पद संग्रहित थे। किंतु अब सात-आठ हजार पद ही मिलते हैं।
२. सूरसारावली
३. साहित्य-लहरी - जिसमें उनके कूट पद संकलित हैं।
४. नल-दमयन्ती
५. ब्याहलो
उपरोक्त में अन्तिम दो अप्राप्य हैं।

नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के १६ ग्रन्थों का उल्लेख है। इनमें सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्, गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी, आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं। इनमें प्रारम्भ के तीन ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं, साहित्य लहरी की प्राप्त प्रति में बहुत प्रक्षिप्तांश जुड़े हुए हैं।
सूरसागर का मुख्य वर्ण्य विषय श्री कृष्ण की लीलाओं का गान रहा है।
सूरसारावली में कवि ने कृष्ण विषयक जिन कथात्मक और सेवा परक पदो का गान किया उन्ही के सार रूप मैं उन्होने सारावली की रचना की।
सहित्यलहरी मैं सूर के दृष्टिकूट पद संकलित हैं।

सूर-काव्य की विशेषताएँ

1. सूर के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के अनुग्रह से मनुष्य को सद्गति मिल सकती है। अटल भक्ति कर्मभेद, जातिभेद, ज्ञान, योग से श्रेष्ठ है।
2. सूर ने वात्सल्य, श्रृंगार और शांत रसों को मुख्य रूप से अपनाया है। सूर ने अपनी कल्पना और प्रतिभा के सहारे कृष्ण के बाल्य-रूप का अति सुंदर, सरस, सजीव और मनोवैज्ञानिक वर्णन किया है। बालकों की चपलता, स्पर्धा, अभिलाषा, आकांक्षा का वर्णन करने में विश्व व्यापी बाल-स्वरूप का चित्रण किया है। बाल-कृष्ण की एक-एक चेष्टाओं के चित्रण में कवि कमाल की होशियारी एवम् सूक्ष्म निरीक्षण का परिचय देते हैं-
मैया कबहिं बढैगी चौटी?
किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।
सूर के कृष्ण प्रेम और माधुर्य प्रतिमूर्ति है। जिसकी अभिव्यक्ति बड़ी ही स्वाभाविक और सजीव रूप में हुई है।
3. जो कोमलकांत पदावली, भावानुकूल शब्द-चयन, सार्थक अलंकार-योजना, धारावाही प्रवाह, संगीतात्मकता एवम् सजीवता सूर की भाषा में है, उसे देखकर तो यही कहना पड़ता है कि सूर ने ही सर्व प्रथम ब्रजभाषा को साहित्यिक रूप दिया है।
4. सूर ने भक्ति के साथ श्रृंगार को जाड़कर उसके संयोग-वियाग पक्षों का जैसा वर्णन किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है।
5. सूर ने विनय के पद भी रचे हैं, जिसमें उनकी दास्य-भावना कहीं-कहीं तुलसीदास से आगे बढ़ जाती है-
हमारे प्रभु औगुन चित न धरौ।
समदरसी है मान तुम्हारौ, सोई पार करौ।
6. सूर ने स्थान-स्थान पर कूट पद भी लिखे हैं।
7. प्रेम के स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में किसी और कवि ने नहीं किया है यह सूरदास की अपनी विशेषता है। वियोग के समय राधिका का जो चित्र सूरदास ने चित्रित किया है, वह इस प्रेम के योग्य है।
8. सूर ने यशोदा आदि के शील, गुण आदि का सुंदर चित्रण किया है।
9. सूर का भ्रमरगीत वियोग-श्रृंगार का ही उत्कृष्ट ग्रंथ नहीं है, उसमें सगुण और निर्गुण का भी विवेचन हुआ है। इसमें विशेषकर उद्धव-गोपी संवादों में हास्य-व्यंग्य के अच्छे छींटें भी मिलते हैं।
10. सूर काव्य में प्रकृति-सौंदर्य का सूक्ष्म और सजीव वर्णन मिलता है।
11. सूर की कविता में पुराने आख्यानों और कथनों का उल्लेख बहुत स्थानों में मिलता है।
12. सूर के गेय पदों में ह्रृदयस्थ भावों की बड़ी सुंदर व्यजना हुई है। उनके कृष्ण-लीला संबंधी पदों में सूर के भक्त और कवि ह्रृदय की सुंदर झाँकी मिलती है।
13. सूर का काव्य भाव-पक्ष की दृष्टि से ही महान नहीं है, कला-पक्ष की दृष्टि से भी वह उतना ही महत्वपूर्ण है। सूर की भाषा सरल, स्वाभाविक तथा वाग्वैदिग्ध पूर्ण है। अलंकार-योजना की दृष्टि से भी उनका कला-पक्ष सबल है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सूर की कवित्व-शक्ति के बारे में लिखा है- सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकार-शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे-पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है, रूपकों की वर्षा होने लगती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि सूरदास हिंदी साहित्य के महाकवि हैं, क्योंकि उन्होंने न केवल भाव और भाषा की दृष्टि से साहित्य को सुसज्जित किया, वरन् कृष्ण-काव्य की विशिष्ट परंपरा को भी जन्म दिया है।
कृष्ण-काव्य-धारा की विशेषताएँ
कृष्ण-काव्य-धारा के मुख्य प्रवर्तक हैं- श्री वल्लभाचार्य। उन्होंने निम्बार्क, मध्व और विष्णुस्वामी के आदर्शों को सामने रखकर श्रीकृष्ण का प्रचार किया। श्री वल्लभाचार्य द्वारा प्रचारित पुष्टिमार्ग में दीक्षित होकर सूरदास आदि अष्टछाप के कवियोंने कृष्ण-भक्ति-साहित्य की रचना की। वल्लभाचार्य ने पुष्टिमार्ग का प्रचार-प्रसार किया। जिसका अर्थ है- भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति से उनकी कृपा और अनुग्रह की प्राप्ति करना।

कृष्ण-काव्य-धारा की प्रमुख विशेषताएँ-

1. श्रीकृष्ण-साहित्य का मुख्य विषय कृष्ण की लीलाओं का गान करना है। वल्लभाचार्य के सिद्धांतो से प्रभावित होकर इस शाखा के कवियों ने कृष्ण की बाल-लीलाओं का ही अधिक वर्ण किया है। सूरदास इसमें प्रमुख है।
2. इस शाखा में वात्सल्य एवम् माधुर्य भाव का ही प्राधान्य है। वात्सल्य भाव के अंतर्गत कृष्ण की बाल-लीलाओं, चेष्टाओं तथा माँ यशोदा के ह्रृदय की झाँकी मिलती है। माधुर्य भाव के ् अंतर्गत गोपी-लीला मुख्य है। सूरदास के बारे में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है- वात्सल्य के क्षेत्र में जितना अधिक उद्धाटन सूर ने अपनी बंद आँखों से किया, इतना किसी ओर कवि ने नहीं। इन क्षेत्रों का तो वे कोना-कोना झाँक आये।
3. इस धारा के कवियों ने भगवान कृष्ण की उपासना माधुर्य एवम् सख्य भाव से की है। इसीलिए इसमें मर्यादा का चित्रण नहीं मिलता।
4. श्रीकृष्ण काव्य में मुक्त रचनाएँ ही अधिक पाई जाती हैं। काव्य-रचना के अधिकांशतः उन्होंने पद ही चुने हैं।
5.इस काव्य में गीति-काव्य की मनोहारिणी छटा है। इसका कारण है- कृष्ण-का्य की संगीतात्मक्ता। कृष्ण-काव्य में राग-रागिनियों का सुंदर उपयोग हुआ है।
6. श्रीकृष्ण काव्य में विषय की एकता होने के कारण भावों में अधिकतर एकरूपता पाई जाती है।
7. श्रीकृष्ण को भगवान मानकर पदों की विनयावली द्वारा पूजा जाने के कारण इसमें भावुकता की तीव्रता अधिक पाई जाती है।
8. इस काव्य-धारा में उपमा, रूपक तथा उत्प्रेक्षा अलंकारों का प्रयोग किया गया है।
9. कृष्ण-काव्य-धारा की भाषा ब्रज है। ब्रजभाषा की कोमलकांत पदावली का प्रयोग इसमें हुआ है। यह मधुर और सरस है।
10. इस काव्य में रसमयी उक्तियों के लिए तथा साकार ईश्वर के प्रतिपादन के लिए भ्रमरगीत लिखने की परंपरा प्राप्त होती है।
11. श्रीकृष्ण-काव्य स्वतंत्र प्रेम-प्रधान काव्य है। इन्होंने प्रेमलक्षणा भक्ति को अपनाया है। इसलिए इसमें मर्यादा की अवहेलना की गई है।
12. कृष्ण-काव्य व्यंग्यात्मक है। इसमें उपालंभ की प्रधानता है। सूर का भ्रमरगीत इसका सुंदर उदाहरण है।
13. श्रीकृष्ण काव्य में लोक-जीवन के प्रति उपेक्षा की भावना पाई जाती है। इसका मुख्य कारण है- कृष्ण के लोकरंजक रूप की प्रधानता।
14. श्री कृष्ण-काव्य-धारा में ज्ञान और कर्म के स्थान पर भक्ति को प्रधानता दी गई है। इसमें आत्म-चिंतन की अपेक्षा आत्म-समर्पण का महत्व है।
15. प्रकृति-वर्णन भी इस धारा में मिलता है। ग्राम्य-प्रकृति के सुंदर चित्र इसमें हैं।

*****

Phrase (वाक्यांश)

  • जो कहा न जा सके - अकथनीय
  • जिसे क्षमा न किया जा सके - अक्षम्य
  • जो गिना न जा सके - अगणित
  • जहाँ पहुँचा न जा सके - अगम, अगम्य
  • जिसे कभी बुढ़ापा न आये - अजर
  • जिसका कोई शत्रु ही न जन्मा हो - अजातशत्रु
  • इतिहास का ज्ञाता - अतिहासज्ञ
  • जिसके समान कोई दूसरा न हो - अद्वितीय
  • जहा अनाथ रहते हों - अनाथाश्रम
  • जो बहुत आवश्यक हो - अनिवार्य
  • जिसकी कोई उपमा न हो - अनुपम
  • जो परिचित न हो - अपरिचित
  • जिसका पार ना पाया जाये - अपार
  • जो आँखों के सामने न हो - अप्रत्यक्ष
  • जो बात पहले कभी ना हुई हो - अभूतपूर्व
  • जो कभी ना मरे - अमर
  • जिसका कोई मूल्य न हो - अमूल्य
  • जो इस लोक से बाहर की बात हो - अलौकिक
  • जिसे बहुत कम ज्ञान हो, थोड़ा जानने वाला - अल्पज्ञ
  • बिना वेतन का - अवैतनिक
  • जो कानून के विरुद्ध हो - अवैध
  • आज्ञा का पालन करने वाला - आज्ञाकारी
  • आलोचना करने वाला - आलोचक
  • ईश्वर में आस्था रखने वाला - आस्तिक
  • इतिहास को जानने वाला - इतिहासकार
  • दूसरों पर उपकार करने वाला - उपकारी
  • जिस पर उपकार किया गया हो - उपकृत
  • ऊपर लिखा गया - उपरिलिखित
  • ऊपर कहा हुआ - उपर्युक्त
  • किसी की हँसी उड़ाना - उपहास
  • जो अपने माता पिता का   एक बुरा  पुत्र (बेटा) हो - कपूत
  • कल्पना से परे हो - कल्पनातीत
  • जो काम से जी चुराता हो - कामचोर
  • तेज बुद्धिवाला - कुशाग्रबुद्धि
  • जो उपकार मानता है - कृतज्ञ
  • जो क्षमा करने के योग्य हो - क्षम्य
  • जो टुकड़े-टुकड़े हो गया हो - खंडित
  • आकाश को चूमने वाला - गगनचुंबी
  • गणित का ज्ञाता - गणितज्ञ
  • जिसे गुप्त रखा जाए - गोपनीय
  • जिससे घृणा की जाए - घृणित
  • हाथ में चक्र धारण करनेवाला - चक्रपाणि
  • जिसकी चार भुजाएँ हों - चतुर्भुज
  • चिंता में डूबा हुआ - चिंतित
  • रोगी की चिकित्सा करने वाला - चिकित्सक
  • जो बहुत समय कर ठहरे - चिरस्थायी
  • जो जन्म से अंधा हो - जन्मांध
  • जानने की इच्छा रखने वाला - जिज्ञासु
  • जिसने इंद्रियों को जीत लिया हो - जितेंद्रिय
  • ज्ञान देने वाली - ज्ञानदा
  • जिसे देखकर डर (भय) लगे - डरावना, भयानक
  • जो किसी पक्ष में न हो - तटस्थ
  • तत्व को जानने वाला - तत्वज्ञ
  • तप करने वाला - तपस्वी
  • दुखांत नाटक - त्रासदी
  • भूत-वर्तमान-भविष्य को देखने (जानने) वाले - त्रिकालदर्शी
  • दया करने वाला - दयालु
  • देखने योग्य - दर्शनीय
  • जिसका आचरण अच्छा न हो - दुराचारी
  • जहाँ पहुंचना  मुश्किल हो - दुर्गम
  • बहुत तेज चलने वाला - द्रुतगामी
  • जिसकी धर्म में निष्ठा हो - धर्मनिष्ठ
  • बिलकुल बरबाद हो गया हो - ध्वस्त
  • आकाश में उड़ने वाला - नभचर
  • जो थोड़ी देर पहले पैदा हुआ हो - नवजात
  • नगर में वास करने वाला - नागर
  • ईश्वर पर विश्वास न रखने वाला - नास्तिक
  • जिसका आकार न हो - निराकार
  • जिसका कोई आधार न हो - निराधार
  • मांस न खाने वाला - निरामिष
  • जिसकी उपमा न हो - निरुपम
  • रात में घूमने वाला - निशाचर
  • जिसके कोई संतान न हो - निसंतान
  • पंद्रह दिन में एक बार होने वाला - पाक्षिक
  • जिसका संबंध पश्चिम से हो - पाश्चात्य
  • जहा पुस्तकें (किताबें)  पढने के लिए रखी जाती हों - पुस्तकालय
  • जो आँखों के सामने हो - प्रत्यक्ष
  • प्रिय बोलने वाली स्त्री - प्रियंवदा
  • फेन से भरा हुआ - फेनिल
  • जिसकी बहुत अधिक चर्चा हो - बहुचर्चित
  • बच्चों के लिए काम की वस्तु - बालोपयोगी
  • मयूर की तरह आँखों वाली - मयूराक्षी
  • जो मां  का भक्त  हो - मातृभक्त
  • मास में एक बार आने वाला - मासिक
  • कम खर्च करने वाला - मितव्ययी
  • मछली की तरह आँखों वाली - मीनाक्षी
  • कीर्तिमान पुरुष - यशस्वी
  • खून से रँगा हुआ - रक्तरंजित
  • रचना करने वाला - रचयिता
  • अत्यंत सुन्दर स्त्री - रूपसी
  • जिसके नीचे रेखा हो - रेखांकित
  • जो इस लोक की बात हो - लौकिक
  • जिस स्त्री के कभी संतान न हुई हो - वंध्या (बाँझ)
  • जो वन में घूमता हो - वनचर
  • जिसका वर्णन न किया जा सके - वर्णनातीत
  • जिसका पति मर गया हो - विधवा
  • जिसकी पत्नी मर गई हो - विधुर
  • सौतेली माँ - विमाता
  • जो विश्व में विख्यात  हो| - विश्वविख्यात
  • व्याकरण जाननेवाला - वैयाकरण
  • जो शरण में आया हो - शरणागत
  • फल-फूल खाने वाला - शाकाहारी
  • अच्छे चरित्र वाला - सच्चरित्र
  • सत्य बोलने वाला - सत्यवादी
  • जो अपने माता पिता का   एक अच्छा  पुत्र (बेटा) हो - सपूत
  • सब कुछ जानने वाला - सर्वज्ञ
  • जहाँ पहुंचना  सरल हो - सुगम
  • जिसे प्राप्त करना सरल हो - सुलभ
  • जो स्थिर रहे - स्थावर
  • जो स्वयं पैदा हुआ हो - स्वयंभू
  • हाथ से लिखा हुआ - हस्तलिखित
  • हिंसा करने वाला - हिंसक
  • हित चाहने वाला - हितैषी